बॉयोडायनेमिक खेती : कृषि पंचांग द्वारा विकसित कृषि की नयी तकनीक



परिचय: भारतीय चिन्तन और जीवन शैली आदिकाल से प्रकति सापेक्ष रहे हैं। भारतीय जीवन दृष्टि में ज्ञान-विज्ञान की अभिव्यक्ति भी अध्याय दर्शन से होती है। शास्त्र-पुराणादि में भारत में प्राचीनकाल से ही मुहूर्त देखकर कृषि कार्य करने का प्रचलन रहा है । कृषक ग्रह, नक्षत्रों व चन्द्रमा की स्थिति को देखकर फसल की बुआई, कटाई, फसल का चुनाव आदि कृषि कार्य करते थे। परन्तु शनैः शनै: यह ज्ञान समाप्त होता गया। सन् 1924 मे विद्वान दार्शनिक डॉ. रूडोल्फ स्टेनर ने एक वैकल्पिक कृषि के रूप में बॉयोडायनेमिक खेती की विचार धारा का प्रतिपादन किया, जो बाद में विश्व के कई देशों में व्यवसायिक रूप से अपनायी जाने लगी। बॉयोडायनेमिक खेती को जैव गति की कृषि भी कहा जाता है जिसमें नक्षत्रों की गति के आधार पर कृषि क्रियाओं का क्रमवार वैज्ञानिक विधि से अपनाने पर जोर दिया जाता है जिससे आकाशीय/नक्षत्रीय ऊर्जा का प्रभाव वनस्पति/पौधों के भागों जैसे जड़, पत्ती, फल एवं बीज पर पड़ता है और पैदावार में गुणोत्तर वृद्धि प्राप्त की जा सकती है।

प्रतिवर्ष नक्षत्रों की गति के आधार पर जैव गतिकीय कृषि एवं बागवानी पंचांग तैयार किया जाता है जिसके अनुसार कृषि कार्य उपयुक्त समय पर करने से लाभ होता है। रूडोल्फ स्टेनर के अनुसार प्रत्येक खेत प्राणी के समान जीवित माध्यम है।यह वैज्ञानिक तथ्य है कि पृथ्वी पर उपस्थित जल को चन्द्रमा अपनी ओर आकर्षित करता है।पौधों की कोशिकाओं में जल प्रमुखता से पाया जाता है।अतः यह माना जा सकता है कि चन्द्रमा की गतिविधियों का प्रभाव निश्चित रूप से पौधों पर पड़ता है। भूमि में उपलब्ध जल का प्रभाव फसल पौधो पर पड़ता है। भूमि में उपलब्ध जल का फसल उत्पादन के लिये अत्यधिक महत्व है। विश्व में कई देशों जैसे आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, जर्मनी आदि में प्रतिवर्ष कृषि पंचांग प्रकाशित हो रहा है जिसका उपयोग वहाँ के कृषक कृषि कार्यो में करके बेहतर फसल उत्पादन कर रहे हैं। कृषि पंचांग मूलतः चन्द्रमा की गतिपर आधारितहै। भारत में विक्रम संवत मास, पक्ष और तिथि कृषि पंचांग के प्रमुख अंग हैं।

चन्द्रमा की विभिन्न अवस्थाएँ (चन्द्रकलाएँ : तिथि)
प्रथम पक्ष (शुक्ल पक्ष) – चन्द्रमा की गति अन्धकार से प्रकाश की ओर गति होती है। प्रारम्भ में सूर्य एवं पृथ्वी के बीच अवस्थित चन्द्रमा की बाहरी पृथ्वी फलक की ओर गतिमान होता है। लगभग 7 दिनों (प्रथम भाग) में चन्द्र मध्य बिन्दु तक पहुँचकरअर्द्ध प्रकाशित होता है तथा अगले 7 दिनों ( द्वितीय भाग) में चन्द्र बाहरी बिन्दु तक पहुँचकर पूर्ण प्रकाशित होता है जिसे पूर्णिमा कहते हैं।

द्वितीय पक्ष (शुक्ल पक्ष) – इस कला में चन्द्रमा पुनः अपनी पुर्व स्थिति में पहुँचने के लिये गतिमान होता है तथा अगले 7 दिनों (तृतीय भाग) में चन्द्रमा का आधा भाग सूर्य की तरफ होता है एवं आधा भाग अंधकारमय होता है। अन्तिम 7 दिनों (चतुर्थ भाग) में चन्द्रमा पूर्णतः सूर्य और पृथ्वी के बीच पहुँच जाता है व पूर्ण अन्धकारमय हो जाता है। इसे अमावस्या कहते हैं।

व्यक्त भावनाओं एवं आस्थाओं के पीछे व्यापक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। इसी भारतीय वैज्ञानिक संस्कृति का एक उदाहरण है भारत में विभिन्न कार्यो को सम्पादित करने के लिये पंचाग का उपयोग किया जाता है । भारतीय ऋषि – मुनियों एवं शास्त्र वेत्ताओं ने यह माना कि जल, जमीन, वायुमण्डल तथा अग्नि तत्व तथा नक्षत्र मनुष्य जीवन तथा इससे सम्बधित क्रियाओं को प्रभावित करता है जिनको सही रूप से परिभाषित कर मानव जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है। भारतीय पंचांग तिथिवार श्रेष्ठ, शुभ, प्रिय, अशुभ आदि सम्भावित खगोलीय एवं सृष्टिगत प्रभावों का मानव जीवन में लागू करने की सिफारिशें एवं गहरी जीवन दृष्टि का संकलन है। आधुनिक उपकरणों एवं तकनीकों के विकास के साथ आज का विज्ञान भारतीय पंचांग या केलेण्डर का आंकलन कर इस ज्ञान की वैज्ञानिक अवधारणा को पुनर्स्थापित कर रहा है।

इसी अनुसार भारत में कृषि के विभिन्न कार्यो को सम्पन्न करने के लिये नक्षत्र एवं वायुमण्डलीय प्रभावों के शुभ तथा अशुभ तिथि, वार, घड़ी एवं अनुभवजन्य प्रथाओं का उपयोग किया जाता है । इस केलेण्डर या पंचांग का उपयोग प्रकृति को लेकर सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रभावों का सार्वभौमिक लाभ लेकर कृषि को अधिक कल्याणकारी एवं पोषक बनाया जा सकता है । विश्व आधुनिक कृषि वैज्ञानिकों ने कृषि पंचांग का महत्व प्रतिपादित किया है। एक बार शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की गति करने में चन्द्रमा को 29.5दिन का समय लगता है। जिसका वर्णन पूर्व में किया जा चुका है।

कृषि कार्य में महत्व

1. पूर्णिमा के समय चन्द्र का सर्वाधिक आकर्षण जल तत्व पर होता है। पृथ्वी और पौधों के अन्दर का जल चन्द्र की इस अवस्था में ऊपर की ओर गतिमान होता है और उच्चतम स्तर पर होता है। चन्द्रमा के इस प्रभाव से वातावरण में आर्द्रता होती है। अतः यदि पूर्णिमा के 48 घण्टे पूर्व बीजों की बुआई की जाये तो अंकुरण में वृद्धि होती है तथा पौधे निरोगी रहते हैं।
2. पूर्णिमा के समय अधिक आर्द्रता होने के कारण फफूंद तथा अन्य सूक्ष्म जीवाणुओं का प्रकोप अधिक होता है अतः फसल की कटाई इस समय नही करनी चाहिये।
3. अमावस्या के समय नमी कम होती है इसलिये ऐसे समय कटाई की जाये तो फसलोपरान्त होने वाली हानि कम होती है। बीज व दाने स्वस्थ व स्वादिष्ट होते हैं।

चन्द्र उत्तरायण एवं दक्षिणायन पक्ष
चन्द्रमा 27.3दिन में एक बार उत्तरायाण एवं दक्षिणायन की गति पूर्ण करता है। यह अवस्था चन्द्रमा के शुक्ल व कृष्ण पक्ष से भिन्न होती है।

चन्द्र उत्तरायण पक्ष का कृषि कार्य में महत्व
1. चन्द्र उत्तरायण की अवस्था में पृथ्वी की ऊपरी सतह पर क्रियाशीलता में बढ़ोतरी होती है। जल तत्व पौधों में ऊपर की ओर गति करता है जिससे फसल के कायिक भाग पत्ती,तना, फल एवं फूल में वृद्धि होती है।
2. इस अवस्था में पत्तीदार फसलो की कटाई, फलों की तुड़ाई, कलम लगाना तथा चारे की कटाई करना उत्तम रहता है।
3. बीजों की बुआई इस अवस्था में करने से अंकुरण अच्छा होता है तथा रोग की सम्भावना कम रहती है।

पृथ्वी से चन्द्रमा की अति निकटता या अति दूरी
चन्द्रमा अपनी कक्षा में पृथ्वी के चारों ओर अण्डाकार कक्ष में घूमता है। अतः चन्द्र लगभग 7 दिन के अन्तराल से पृथ्वी के अति पास या अति दूर होता है। जब चन्द्रमा पृथ्वी से अति दूर होता है तो इसे (अपभू) कहते हैं। जबचन्द्रमा पृथ्वी के अति पास होता है तो इसे(उपभू) कहते हैं। इस समय बोये गयेबीजों से कमजोर पौधे बनते हैं। इसदोनों ही स्थितियों में कोई भी कृषि कार्य नही करना चाहिये।

चंद्रमा की दशाओं का पादप की वृद्धि पर प्रभाव चन्द्र दक्षिणायन पक्ष का कृषि कार्य में महत्व

1. चन्द्र दक्षिणायन की अवस्था में ब्रह्माण्डीय शक्तियों का प्रभाव मृदा की सतह से नीचे के भाग पर संकेन्द्रित होता है जिससे भूमि क्रिया शीलता में वृद्धि होती है। अतः इस अवस्था में कन्द फसलों जैसे अश्वगन्धा,सफेद मूसली आदि की गुणवक्ता एवं उत्पादन में वृद्धि होती है।
2. सींग की खाद बनाना, निकालना, खेत में डालना, कम्पोस्ट बनाना व खेत में मिलाना, जुताई करना,निराईएवं गुड़ाई करना आदि कार्यो के लिये यह समय सर्वोतम है। हरी खाद बनाना,पलटना व सिंचाई के लिये भी यह उपयुक्त समय है।

Mr. Deepak Nagar, Assistant Professor, School of Agricultural Sciences, Career Point University, Kota

7 thoughts on “बॉयोडायनेमिक खेती : कृषि पंचांग द्वारा विकसित कृषि की नयी तकनीक”

  1. में भी एक छोटे से गांव से से हूं लेकिन गांव में आज भी फसलों कि कटाई बुवाई मुहूर्त पर ही करते है किन्तु सर आपने जो चन्द्रमा की विभिन्न स्थितियों के बारे मैं जो बताया जिसमे कृषि में कितना लाभकारी व हानि कारक है वो किसानों को नहीं पता लेकिन आपने जो बताया है सत प्रतिशत सई हे

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *