महुआ :बहुउपयोगी पौधा


परिचय :
वनस्पतिशास्त्र में इसका वैज्ञानिक नाम मधुका लोंगफोलिआ है जो पादपों के सपोटेसी परिवार से सम्बन्धित वृक्ष है। परन्तु संस्कृत में इसे मधूक या गुडपुष्प व अंग्रेजी में बटर ट्री नाम से जानते हैं।महुआ रेगिस्तानी इलाकों के अलावा देश के लगभग सभी भू-भागों में देखने को मिल जाते हैं। लेकिन उत्तर व मध्य भारत के मैदानी क्षेत्रों व वनों में ये बहुतायत में मिलते हैं। चूँकि यह उष्णकटिबंधीय वृक्ष हैं अर्थात कम पानी होने के बावजूद यह हल्की नमी होने पर भी तेजी से बड़ा हो जाता है। इसकी ऊँचाई 20 मीटर तक की हो सकती है।

वनस्पति जगत में ऐसे पेड़-पौधे बहुत कम हैं जिनका हर भाग व अंग जैसे तना, छाल, पत्तियाँ, फूल, फल व बीज किसी-न-किसी रूप में न केवल इंसानों के बल्कि विभिन्न प्रजाति के जीव-जन्तुओं के लिये बहु उपयोगी होते हैं।

भारत में भी एक ऐसा छायादार वृक्ष मौजूद है जिसके लगभग सभी अंग न केवल बहु उपयोगी हैं बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पोषित एवं सुदृढ़ भी करते हैं। कल्प वृक्ष की भाँति यह वृक्ष और कोई नहीं बल्कि हमारे ग्रामीण परिवेश व वनों में पाया जाने वाला सदाबहार महुआ है जो विषम परिस्थितियों में भी जीवित रहता है।

महुआ रेगिस्तानी इलाकों के अलावा देश के लगभग सभी भू-भागों में देखने को मिल जाते हैं। लेकिन उत्तर व मध्य भारत के मैदानी क्षेत्रों व वनों में ये बहुतायत में मिलते हैं। चूँकि यह उष्णकटिबंधीय वृक्ष हैं अर्थात कम पानी होने के बावजूद यह हल्की नमी होने पर भी तेजी से बड़ा हो जाता है। इसकी ऊँचाई 20 मीटर तक की हो सकती है।

शुष्क वातावरण में भी इसके बीज राकड़ अथवा पथरीली जैसी पड़त भूमि में आसानी से उग जाते हैं। इसके बीजों को फैलाने का काम परिंदे, गिलहरियाँ, लंगूर व शाकाहारी घरेलू व जंगली जानवर कर देते हैं। इसीलिये महुआ के पेड़ कहीं पर भी उगे मिलते हैं।

दरअसल इसके फल (डोरमा) गुदायुक्त, स्वादिष्ट व मीठे होने से पशु-पक्षी इनको बड़े चाव से खाते हैं। इन फलों का गुदायुक्त भाग पशुओं में आसानी से पच तो जाता है लेकिन इनके बीजों का आवरण शख्त होने से ये पच नहीं पाते और पशु के गोबर अथवा मल के साथ ये साबुत ही बाहर निकल आते हैं। पशु जहाँ-जहाँ भी गोबर करते हैं वहाँ-वहाँ इसके बीज फैल व उग जाते हैं।

महुआ के फूलों की गंध का जैविक महत्त्व :
बसंत ऋतु से लेकर होली तक पतझड़ में महुआ की पत्तियाँ झड़ जाती हैं। परन्तु नई कोपलों के फूटने के पूर्व इसकी डालियाँ फूलों से लकदक होने लगती हैं। जब इसके फूल (महुआ या मऊड़ा) पूर्ण यौवन पर होते हैं तब इनसे मदमस्त करने वाली मीठी-मीठी गंध सूर्योदय पूर्व आस-पास के वातावरण व जंगलों में धीरे-धीरे पसर जाती है। यह महक न केवल कामुकता को प्रेरित करती है बल्कि यह दूर-दराज के कीट-पतंगों, पशु-पक्षियों, लंगूरों व गिलहरियों को जबरदस्त आकर्षित भी करती है।

महुआ के फूल कमाल के रसीले और मीठे होते हैं। इनको चूसने के लिये कीट-पतंगों में जबरदस्त होड़ लगी रहती है वहीं इन्हें खाने को विभिन्न प्रजाति के पशु-पक्षी दूर-दूर से खींचे आते हैं। ये फूल फोटोट्रॉपिक होते हैं अर्थात सूर्य की रोशनी के प्रति ये संवेदनशील होते हैं और ये सूर्य की रोशनी में ही खिलते हैं।

महुआ की बहु उपयोगिता :
महुआ कमाल का सदाबहार छायादार वृक्ष है। इसके हर भाग व अंग न केवल मनुष्यों के लिये बल्कि छोटे-बड़े जीव-जन्तुओं के लिये भी उपयोगी होते हैं। तपती गर्मी में इसकी ठंडी छाँव में मनुष्य व वन्यजीव सुकून से आराम करते हैं। यह कई पक्षियों का सुरक्षित आश्रय है जहाँ ये बिना किसी भय से अपनी वंश वृद्धि करते हैं। यह वृक्ष प्राणवायु का बड़ा व बेहतरीन स्रोत है। इसके आस-पास के वातावरण में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन होती है।

गरीब तबके के लोगों को महुआ से साल भर के लिये ईंधन हेतु जलाऊ लकड़ी मिल जाती है। इसकी छाल, फल व फूल में औषधिय गुण होने से इनका उपयोग आयुर्वेदिक उपचार में किया जाता है। भोजन करने के लिये इसके पत्तों से पत्तल व दोने बनाए जाते हैं जो प्रदूषण रहित होते हैं। इसकी पत्तियाँ व फूल पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं इसलिये ये पशुओं के लिये बेहतरीन पौष्टिक आहार होते हैं। इनको खिलाने से पशु में दूध की गुणवता व मात्रा दोनों में ही बढ़त होती है। इसके सूखे फूलों से देशी मदिरा बनती है। इसको पीकर लोग अक्सर अपनी थकान मिटाते हैं।

Dr. Rakesh Kumar Meena, Associate Professor, Department of Horticulture, School of Agricultural Sciences, Career Point University, Kota

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