कड़कनाथ मुर्गी पालन एवं रोग से सम्बंदित आवश्यक जानकारी


परिचय- इस नसल का मूल स्थान भारत है और यह मध्य प्रदेश में पायी जाती है। इसे काली मासी के नाम से भी जाना जाता है। यह नसल इसके अच्छे स्वाद वाले मीट उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। इसकी काली टांगें, काले पंजे, काली चोटी, काली गर्दन, और काले रंग का मांस और हड्डियां होती हैं। इस नसल के अंडे हल्के भूरे रंग के होते हैं। इनके पैर, पंजे, और चोंच सलेटी रंग की होती है। जीभ जामुनी रंग की होती है। कुछ आंतरिक अंगों में गहन काला रंग देखा जाता है। यह नसल मुख्यत: प्रतिवर्ष 80 अंडों का उत्पादन करती है। इसके अंडे का औसतन भार 46.8 ग्राम होता है।

आहार:-
प्रोटीन : 0-10 सप्ताह के मुर्गी के बच्चों के आहार में 10-20 प्रतिशत प्रोटीन होना जरूरी है। वृद्धि के लिए उनके आहार में लगभग 15-16 प्रतिशत प्रोटीन होना जरूरी है |

पानी : मुर्गी के बच्चों के पहले पानी में 1/4 कप चीनी और 1 चम्मच टैरामाइसिन शामिल होना चाहिए और दूसरे पानी में 1 चम्मच टैरामाइसिन शामिल होना चाहिए|

कार्बोहाइड्रेट्स : उनके भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स की मात्रा 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसे पचाना उनके लिए मुश्किल होता है।

खनिज सामग्री : खनिज सामग्री में कैल्शियम, मैगनीशियम, सोडियम, पोटेशियम, फास्फोरस, क्लोरीन, सल्फर, मैगनीज़, आयरन, कॉपर, आयोडीन, जिंक, कोबाल्ट और सेलेनियम शामिल हैं।

नए जन्में बच्चों की देखभाल : अंडों को उपयुक्त तापमान देकर 21 दिनों के लिए इनक्यूबेटर में रखा जाता है। अंडे सेने के बाद बच्चों को 48 घंटे बाद इनक्यूबेटर से निकाल लिया जाता है। इनक्यूबेटर से निकालने के दौरान बच्चों की संभाल बहुत सावधानी से की जानी चाहिए। इनक्यूबेटर से बच्चों को निकालने के बाद उन्हें ब्रूडर में रखा जाता है। पहले सप्ताह के लिए ब्रूडर का तापमान 95꠶ F होना जरूरी है और प्रत्येक सप्ताह इसका तापमान 5꠶F कम करना जरूरी है।

टीकाकरण :

  • जब बच्चा 4-7 दिन का हो तो उसे रानीखेत बीमारी से बचाने के लिए RD vaccination (F1 strain) का टीका लगवाएं इस टीके का प्रभाव 2-4 महीने तक रहेगा।
  • जब बच्चा 18-21 दिन का हो तो उसे गुमबोरो बीमारी से बचाने के लिए IBD का टीका लगवाएं।
  • 4-5 सप्ताह का हो तो उसे रानीखेत बीमारी से बचाने के लिए RD (F1 strain) का टीका लगवाएं।

मुर्गियों में होने वाले रोग –
र्ब्ड फ्लू: यह इन्फ्लूएंजा के कारण होता है और यह 100% मृत्य दर को बढ़ाता है। यह संक्रमण श्वास नली, आंसू और व्यर्थ पदाथों से आता है। लक्षण – मुर्गियों का सुस्त हो जाना, भूख कम लगना, अंडों का कम उत्पादन और चोटी का पीले रंग में बदल जाना और जल्दी मौत हो जाना है।
इलाज : गड्ढा बनाएं और उसमें दी गई मात्रा में दवाई डालें।ताकि फार्म में जाने से पहले अपने पैरों को इस उपचारित पानी में डुबोया जा सके। फार्म पर कवालिटोल की स्प्रे करके कीटाणुओं को नष्ट करें।
चिकन पॉक्स : यह संक्रमण द्वारा फैलने वाली बिमारी है और यह किसी भी उम्र के पक्षी में फैल सकती है। इसके लक्षण हैं चोटी, आंखों और कानों के आस-पास फोड़ों हो जाते है।
इलाज : चिकन पॉक्स से बचाव के लिए होमियोपैथिक दवाई एन्टीमोनियम टोरटेरी 5 मि.ली. प्रति 100 पक्षियों को दें।
रानीखेत बीमारी :इसे न्यू कैस्टल बीमारी भी कहा जाता है। यह बहुत ही संक्रामक बीमारी है और हर उम्र के पक्षी में फैलती है।
लक्षण : मौत दर का बढ़ना, सांस लेने में समस्या, टांगों और पंखों का कमज़ोर होना।
इलाज : जब बच्चे 1-6 दिन के हों तो इन्हें रानीखेत दवाई F strain का टीका लगवायें और 4 सप्ताह के अंतराल पर F-1 का टीका ब्रॉयलर को लगवाया जाना चाहिए।

Mr. Brahmanand Bairwa, Assistant Professor, School of Agriculture Sciences, Career Point University, Kota

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