अधिक लाभ कमाने के लिए इस प्रकार करें ईसबगोल औषधीय पादप की खेती

परिचय – ईसबगोल एक महत्वपूर्ण औषधी फसल है | इसबगोल की फसल कटाई करते समय इसकी पत्तियाँ हरी रहती है| जो कि पशुओं के हरे चारे में काम आती है|
ईसबगोल की भूसी में अपने वजन के कई गुना पानी सोखने की क्षमता होती है| इसकी भूसी को पेट की सफाई, कब्ज, अल्सर, बवासीर, दस्त (दही के साथ मिलाकर खाने पर) जैसी भारीरिक बीमारियों में औषधी के रूप में प्रयोग किया जाता है| ईसबगोल का प्रिटिंग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में भी उपयोग किया जाता है|

जलवायु :-
इसकी खेती ऊष्ण जलवायु में की जा सकती है| इसकी खेती के लिए सीमान्त भूमि जिसका पी एच मान 7 से 8 के मध्य हो, अच्छी मानी जाती है| इसके लिए ठण्डी एवं शुष्क जलवायु आवश्यक होती है| इसके बीज अंकुरण के समय 20 से 25 डिग्री सेंटीग्रेड, वृद्धि के लिए 30 से 35 सेंटीग्रेड तापमान की जरूरत होती है| फसल पकने के समय वातावरण साफ एवं शुष्क होना आवश्यक है| क्योंकि फसल को बरसात की हल्की बौछार भी भारी नुकसान पहुंचा सकती है|

भूमि:-
ईसबगोल की खेती के लिए मिट्टी का सवाल है, बलुई दोमट मिटटी जिसमें जीवाश्म की मात्रा अधिक हो, सर्वोत्तम मानी जाती है| परन्तु बलुई मिट्टी मे भी समुचित मात्रा में देशी खाद का प्रयोग कर के इसकी खेती की जा सकती है|

खेत की तैयारी:-
खरीफ की फसल की कटाई के बाद खेत की सफाई करके दो से तीन जुताई कर मिट्टी को भुरभरी बनायें| यदि दीमक की समस्या अधिक हो तो फॉरेट 10 जी 20 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से अन्तिम बुवाई के समय भूमि में मिलावें|

उन्नत किस्में :-
ईसबगोल की प्रमुख किस्में जी आइ- 2, ए आर आइ- 89 गुजरात- 1, ट्रांबेसलेक्सन (1 से 10) ई सी- 24 व 145 है| उपरोक्त में से जी आइ- 2 किस्म 118 से 125 दिन में पकती है एवं 13 से 15 क्विंटल प्रति हैक्टर पैदावार देती है तथा भूसी की मात्रा 18-30 % तक की होती है| इसलिये इसकों शुष्क क्षेत्र में अधिक उपयोग में लिया जाता है|

बीज की मात्रा :-
ईसबगोल की छिड़क कर बुवाई करने के लिये प्रति हैक्टर में 4 से 5 किलोंग्राम बीज की आवश्यकता होती है व लाईन में बुवाई करने के लिये प्रति हैक्टर 5 से 7 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है|

बीज एवं बुवाई :-
ईसबगोल बीज बोने का उत्तम समय अक्टुबर के अन्तिम सप्ताह से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक होता है| इसकी बुवाई बीजों को छिड़क कर एवं कतारों में की जा सकती है| कतारों में बुवाई के लिये 25 -30 सेंटीमीटर की दूरी रखी जाती है| लाईनों में बुवाई करने से निराई-गुड़ाई में सुविधा रहती है| बीज को 3 ग्राम थाईरम प्रति किलोग्राम के हिसाब से उपचारित करके तथा बीजों को मिट्टी में मिलाकर बुवाई करें तथा देरी से बुवाई करने से बचें| क्योंकि इससे उत्पादन में कमी एवं कीट व बीमारियों का प्रकोप हो सकता है|

खाद एव उवर्रक :-
ईसबगोल अधिक उत्पादन के लिए के गोबर की खाद 15 -20 टन प्रति हैक्टर खेत की जुताई के समय मे मिलाएं इसके अलावा नत्रजन 50 किलोग्राम, फास्फोरस 40 किलोग्राम एवं पोटास 25 किलोग्राम की आवश्यकता होती है| नत्रजन की आधी एवं फास्फोरस एवं पोटास की पूरी मात्रा बुआई के समय 3 ईच गहरा मिटटी मे मिलाना चाहिए तथा बाकी नत्रजन बुआई के एक महिने बाद छिडकाव करके सिंचाई करे|
सिंचाई प्रबंधन :-
शुष्क क्षेत्र मे सिंचाई का अधिक महत्व रहता है, इसलिए पहली सिंचाई बीज की बुआई के बाद हल्की सिंचाई करे| दुसरी सिंचाई बुआई के एक सप्ताह बाद करे| इसके अलावा शुष्क क्षेत्र मे मौसम के हिसाब से दस दिन पर सिंचाई करते रहें| हर सिंचाई के बाद हल्की निराई-गुडाई करने से रोग एव कीटो का प्रकोप कम हो जाता है|
प्रमुख कीट एवं रोग :-
शुष्क क्षेत्र में कीट एव रोगों का प्रकोप प्रायः नही होता है| फसल के लगने वाले रोग समान्यतः डाउनी मिल्डयू, झुलसा एवं पाउड्री मिल्ड्यू होते है| चूर्णी फफूंद के रोकथाम के लिये 50 % घुलनशील गन्धक का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिडकें| ईबगोल का प्रमुख कीट मोयला (ऐफिड्स) है| जिसकी रोकथाम हेतु डाईमिथॉइट 30 ई सी एक हजार मीलीलीटर प्रति हैक्टर की दर से खड़ी फसल पर छिड़काव करें| यदि फसल में तुलासिता रोग के लक्षण दिखाई दें तो मैंकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर छिड़काव करें|
फसल कटाई :-
ईसबगोल फसल कटाई का उत्तम समय बालियों का लाल होना व हाथ से मसलने पर दाना अलग होने का समय उत्तम होता है| इसकी बालियों को हर दो तीन दिन में पकने की स्थिति के अनुसार तुडाई कर लेनी चाहिये| बालियों को तोड़कर एक जगह इकट्ठा करें| मड़ाई करने से पूर्व हल्का पानी का छिड़काव करें| पानी के छिडकाव से बीज को छिलके से अलग होने में आसानी होती है| मड़ाई के बाद बीज को चार से पांच दिन तक सुखाएं तथा बाद में जूट की बोरियों में संग्रहित कर लें|

पैदावार :
ईसबगोल खेती करने पर प्रति हैक्टर 12 से 15 क्विंटल बीज प्राप्त होता है| इसके अलावा चार से पांच क्विंटल चारा भी प्राप्त होता है| जिसको शुष्क क्षेत्र में हरे चारे के काम में लिया जाता है|

Dr. Rakesh Kumar Meena, Associate Professor, School of Agricultural Sciences, Career Point University, Kota

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *