स्ट्रॉबेरी की खेती


परिचय:- भारत में स्ट्राबेरी की खेती सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में 1960 के दशक से शुरू हुई, परन्तु उपयुक्त किस्मों की अनुउपब्धता तथा तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण इसकी खेती में अब तक कोई विशेष सफलता नहीं मिल सकी। आज अधिक उपज देने वाली विभिन्न किस्में, तकनीकी ज्ञान, परिवहन शीत भण्डार और प्रसंस्कण व परिरक्षण की जानकारी होने से स्ट्राबेरी की खेती लाभप्रद व्यवसाय बनती जा रही है। बहुद्देशीय कम्पनियों के आ जाने से स्ट्राबेरी के विशेष संसाधित पदार्थ जैसे जैम, पेय, कैंडी इत्यादि बनाए जाने के लिये प्रोत्साहन मिल रहा है।

स्ट्राबेरी की किस्में :
स्ट्राबेरी की कई किस्में आपको बता दें कि स्ट्रॉबेरी एक महत्वपूर्ण फल है, जिसमें कई गुण होते हैं। स्ट्राबेरी को विभिन्न तरह की भूमि और जलवायु में लगाया जा सकता है। कुछ ही महीनों में फल दे सकता है। स्ट्राबेरी की बहुत सी किस्मों की खेती की जा सकती है। स्ट्राबेरी की किस्मों की बात करें तो ओसो ग्रेंड, कैमारोजा, ओफरा, चैंडलर, स्वीट चार्ली समेत अन्य कई किस्में हैं।

मिट्टी और जलवायु :
इसकी खेती के लिए कोई मिट्टी तय नही है फिर भी अच्छी उपज लेने के लिए बलुई दोमट मिट्टी को उपयुक्त माना जाता है। इसकी खेती के लिए ph 5.5 से 6.5 तक मान वाली मिट्टी भी उपयुक्त होती है। यह फसल शीतोष्ण जलवायु वाली फसल है जिसके लिए 21 से 30 डिग्री तापमान उपयुक्त रहता है। तापमान बढ़ने पर पौधों में नुकसान होता है और उपज प्रभावित हो जाती है।

खेत की तैयारी:
सितम्बर के प्रथम सप्ताह में खेत की 2-3 बार अच्छी जुताई कर ले फिर उसमे एक हेक्टेयर जमीन में 70 टन अच्छी सड़ी हुई खाद् अच्छे से बिखेर कर मिटटी में मिला दे। साथ में पोटाश और फास्फोरस भी मिट्टी परीक्षण के आधार पर खेत तैयार करते समय मिला दे.

बेड तैयार करना :
खेत में आवश्यक खाद् उर्वरक देने के बाद बेड बनाने के लिए बेड की चौड़ाई 2-3 फिट रखे और बेड से बेड की दूरी डेढ़ फिट रखे। बेड तैयार होने के बाद उस पर ड्रेप एरिगेशन की पाइपलाइन बिछा दे। पौधे लगाने के लिए प्लास्टिक मल्चिंग में 22 से 30 सेमी की दूरी पर छेद करे। स्ट्रॉबेरी के पौधे लगाने का सही समय 15 सितम्बर से 15 अक्टूबर तक लगा देना आवश्यक है। यदि तापमान ज्यादा हो तो पौधे सितम्बर लास्ट तक लगा ले।

खाद् और उर्वरक :
स्ट्रॉबेरी का पौधा काफी नाज़ुक होता है। इसलिए उसे समय समय खाद् और उर्वरक देना ज़रुरी होता है। जो की आपके खेत के मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट को देखकर दे। मल्चिंग होने के बाद तरल खाद् टपक सिंचाई के जरिये दे। जिसमे नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश को कृषि वैज्ञानिकों की सलाह ले कर समय समय पर देते रहें.

सिंचाई :
पौधे लगाने के बाद तुरंत सिंचाई की जाना चाहिए, समय समय पर नमी को ध्यान में रखकर सिंचाई करना चाहिए, स्ट्रॉबेरी में फल आने से पहले सूक्ष्म फव्वारे से सिंचाई कर सकते है फल आने के बाद टपक विधि से ही सिंचाई करे।

लो टनल उपयोग :
पाली हाउस नही होने की अवस्था में किसान भाई स्ट्रॉबेरी को पाले से बचाने के लिए प्लास्टिक लो टनल का उपयोग करे जिसमे पारदर्शी प्लास्टिक चादर, जो 100-300 माइक्रोन की हो उसका उपयोग करना चाहिए.

तुड़वाई :
जब फल का रंग सतर प्रतिशत असली हो जाये तो तोड़ लेना चाहिए। अगर मार्किट दूरी पर है थोड़ा सख्त ही तोडना चाहिए। तुड़वाई अलग अलग दिनों मैं करनी चाहिए। स्ट्रॉबेर्री के फल को नहीं पकड़ना चाहिए। ऊपर से दण्डी पकड़ना चाहिए। औसत फल 8 से 13 टन प्रति हेक्टयेर निकलता है।

पैकिंग :
स्ट्रॉबेरी की पैकिंग प्लास्टिक की प्लेटों में करनी चाहिए। इसको हवादार जगह पर रखना चाहिए। जहां तापमान 5-6 डिग्री हो। एक दिन के बाद तापमान 0 डिग्री होना चाहिए।

कीट और रोग :
कीटों में पतंगे, मक्खियाँ चेफर, स्ट्राबेरी जड़ विविल्स झरबेरी एक प्रकार का कीड़ा, रस भृग, स्ट्रॉबेरी मुकट कीट कण जैसे कीट इसको नुकसान पंहुचा सकते है। इसके लिए नीम की खल पौधों की जड़ों में डाले इसके अलावा पत्तों पर पत्ती स्पाट, ख़स्ता फफूंदी, पत्ता ब्लाइट से प्रभावित हो सकती है। इसके लिए समय समय पर पोधों के रोगों की पहचान कर विज्ञानिकों की सलाह में कीटनाशक दवाइयों का स्प्रे करे।

Dr. Rakesh Kumar Meena, Assistant Professor, School of Agricultural Sciences, Career Point University, Kota

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